संगीत श्रावणामृत

संगीत श्रावणामृत

संगीत श्रावणामृत !
ध्वनी यह एक शक्तिमय तरंग है और वो शक्ती कभी नस्ट नहीं होती। कहते है विश्व की निर्मिती सर्वप्रथम ध्वनी रूप से हुई है। ॐ कार को तो हम सब जानते है। ॐ को सभी मंत्रोका सम्राट-राजा कहाँ जाता है। मन तथा तन से जुड़े इस ॐ कार को भारतीय संगीत में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। कहते है की इसके उच्चारण तथा केवल सुनने से भी रोग परिहार होता है। ध्वनी को जीतनी गहराई के साथ हिंदुस्तानी संगीत में देखा गया है, उतना दुनिया में कहीं और नहीं देखा गया। इस लेख द्वारा जानते है की भारतीय संगीत का अपने तन मन पर कैसा असर होता है।

भारतीय संगीत का अपना एक पुराना इतिहास है। वो आयुर्वेद से भी जुड़ा हुआ है। संगीत से जुडी अनेक कथाऍं हमने सुनी है। संगीत के शक्ती द्वारा दिप जलाना (राग दीप), आसमान में बदलोंसे बारिश का आना (राग मेघमल्हार)। ऐसी बोहोत सारी कथाऍं सुनी है। तो जानते है इस संगीत में होने वाली अनोखी संमोहन शक्ती द्वारा शारीरिक व्याधी पर एक पूरक उपचार के रूप में कैसा उपयोग किया जाता है।
पहले जानते है क्या है ध्वनी का महत्त्व। जानते है सुर और शरीर का क्या नाता है। हम सब जानते है की अच्छे संगीत से हमेशा आनंद तथा मनःशांती प्राप्त होती है। छोटे नन्हे बच्चे अंगाई गीत के सुरों से नींद के आधीन हो जाते है, देश की रक्षा करने वाले जवानों को स्फूर्ति भरा गाना सुनानेसे उनके मन का भय दूर होकर वीर रास से भरे वो युद्ध के लिए तैयार हो जाते है। सुगम तथा गजल गायन की ओर युवा खिंचे जाते है। और बुजुर्ग भजन में मन का आंनद ढूंढते है। यही संगीत, रोग निवारण का काम भी करता है इस जानकारी से हम दूर है। इस स्पर्धा से भरी जिंदगी में हर कोई ध्येय प्राप्ति की ओर दौड़ रहा है। इस भागदौड़ से शरीर की ओर ध्यान न देने से कितना नुकसान उसे पहुँचा रहे हैं इसे हम बेखबर है।
युद्ध, उत्सव और प्रार्थना ऐसे समय मानव गाने बजाने का उपयोग करता चला आ रहा है। भाव पैदा करनेवाले ध्वनीयों को परखकर उसे ताल, सुर और लय में बाँधकर रागों की निर्मिती हुयी है। मन के व्यवहार से जुड़े इस निर्मिती को एक उपचार के रूप में जानना बहोत ही रोचक है। वाकई संगीत में इतनी ताकद है? और अगर है तो कैसे?
संगीत के माध्यम से अपने शरीर की पेशियोंको कंपन के जरिये सचेत किया जाता है। इस कंपन के जरिये रोग निवारक शक्ती (healing power) अपना काम कराती है। रोग के अचूक निदान होने के बाद रोगी को (व्याधिग्रस्त) कौनसा राग , कितने समय तक और कौनसे वक्त सुनना चाहिए ये तज्ञो द्वारा तय किया जाता है। चेन्नई में 'राग रिसर्च सेंटर' में भारतीय शास्त्रीय संगीत के राग और उनका रोगोंपर उपचार स्वरुप इस्तेमाल करना, इसपर संशोधन चल रहाँ है। संगीत तज्ञ , डॉक्टर्स, मानसोपचार तज्ञ की टीम इसपर काम कर रहीं है। बम्बई में प्रसिद्ध सतारवादक और संगीतकार पं शशांक कट्टी इन्होंने इस विषयपर अध्ययन किया है। डॉक्टर्स और आयुर्वेदाचार्य को साथ लेकर उन्होंने ' सुर संजीवन ' नाम की एक उपचार पद्धती विकसीत की है। इसमे ज्यादा रूचि हो या ज्ञान प्राप्त करना चाहते हो तो प्रशिक्षण की सुविधा भी राखी है।
कहते है की जो अच्छे संगीत में ऋची रखता है वो एक आश्वासक व्यक्तित्व प्राप्त करता है। म्युझिक थेरपी से यह स्पष्ट हुआ है की गाने में जो ताकद होती है उससे प्राप्त एक संस्कारक्षम मन तैयार होता है। निराशा, चिंता, अकेलापन, न्यूनगंड की भावना से छुटकारा पाने के लिए तथा सभी नकारात्मक विचारोंको दूर करके मन आनंद, उत्साह, आत्मविश्वास से भरने के लिए ये उपचार पद्धती उत्तम है। संगीत की ध्वनी लहरें, शब्द मन की भावनाओं पर काबू पाते है।
हर कोई भारतीय बहोत भाग्यशाली है। बचपन से हम पर संगीत के संस्कार होना शुरू होता है। बालगीतों से निरागस मन जाग जाता है। भाषा की क्षमता बढ़ाता है। ममता, उत्सुकता ऐसी भावनाओं का स्वीकार करना शुरू हो जाता है। स्फूर्तिगीत, प्रार्थना से बचपन से अपना आयुष्य समृद्ध बनाने का काम शुरू होता है। फ़िल्मी गीत , ग़ज़ल के शब्द पर युवा लोग स्वार है, आयु बढ़ने के बाद भजन की ओर मन खीचा जाता है। इसी प्रकार बचपन से लेके बुढ़ापे तक आदमी संगीत से जुड़ा दिखाई देता है। संगीत सुनने के लिए कुछ व्याधी ग्रस्त होना जरुरी नहीं। प्रार्थना तथा मंत्र पठण के सही उच्चारण से ह्रदय तथा पुरे शरीर में स्पंदनों की अनुभूती होती है। मन शांत होता है, आत्मविश्वास बढ़ाता है, शरीर में ऊर्जा उत्पन्न होती है, एकाग्रता बढाती है। हिन्दुधर्म शास्त्र में शक्ति से भरे मंत्रोच्चारण से, उसके अध्ययन से पुरे व्यक्तित्व को बदलने की ताकद होती है।
अभ्यासकों का कहना है की संगीत से मानव शरीर में हार्मोन्स का ठीक मात्रा में तथा ठीक समय पर निर्माण होने के इस कार्य में संगीत की मदत होती है। जैसे की थाइरोइड से थायरोक्सिन, स्वादुपिंड से इंशुलीन, इंटेस्टाइन से सिक्रिटिन, दिमाग से गाबा, मुत्रपिंड से मेदुला/कॉर्टेक्स ऐसी अनेक संप्रेरक अपना अपना काम नियमित रूप से करते रहते है। अपने मन की अवस्था को आनंदी रखने में एंडोर्फिन ये हार्मोन काम करता है। अभ्यासकों ने बस इसे जानकर कौनसा राग कौनसे व्याधी पर असर करता है ये जानने की कोशिश की। ठीक इसी प्रकार ऋतुमान के अनुसार रागों का क्या असर होता है ये भी जानने की कोशिश की है। वर्षा ऋतु में वात का असर शरिर में ज्यादा दिखता है तो राग मेघमल्हार सुनना है, शरद ऋतु अचानक गर्मी बढने से पित्त की मात्र बढ़ना शुरू होता है तो राग बसंत बहार सुनो। शिशिर में भैरव, बसंत में हिंडोल, ग्रीष्म में दीपक, वर्षा में मेघमल्हार, शरद में मालकंस सुनने से अच्छा असर देखने को मिलता है।
उदाहरण की तौर पर कौनसे रोग/व्याधी पर कौनसा राग और उस राग में बसे कुछ जाने पहचाने गीत बता रहीं हूँ। आप जरूर आनंद उठा सकते है। इसके इस्तेमाल से कोई नुकसान/ साइड इफ़ेक्ट नहीं। कुछ कॉमन बीमारी के बारे में नीचें दिये हुए तक्ते के सहरे छोटीसी कोशिश की है।

कुछ जाने पहचाने गीत शास्त्रीय रागों पर आधारित
जिन्हे सुनकर पिडा से कुछ हद तक आराम पा सकते है।

रोग / पीडा राग गाने

डायबेटीस / मधुमेह
जौनपुरी, जयजयवंती
जलते है किसके लीये – सुजाता
जाये तो जाये कहा – टॅक्सी ड्रायवर
मेरी याद मे टूम ना – मदहोश
मन मोहना बडे – सीमा
बैरन हो गयी रे – देख कबिरा रोया
ठुमक चलत रामचंद्र
जिंदगी आज मेरे नाम से शरामती है

हृदय रोग
दरबारी कानाडा
झनक झनक तोरी बाजे पायलीया – मरे हुजूर
तू प्यार का सागर है – सीमा
अगर मुजसे मुहोब्बत है – आप की परछाईया
तोरा मन दरपन – काजल
मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिये – कन्हय्या
इस प्यार को मै क्या नाम दू – मुझे कुछ केहना है
हंगामा है कयू बरपा – गुलाम अली

ब्लड प्रेशर
अहिर भैरव
भीमपलास
पूर्वी तोडी मुलतानी
मन आनंद आनंद छायो – विजेता
आलबेला साजन आयो रे – हम दिल दे चुके सनम
बहोत शुक्रिया बडी महरबानी
पुछों ना कैसे मेन रेन बितायी – मेरी सूरत तेरी आंखे
नाईनो मे बदरा छाये – मेरा साया
दया करे ए गिरीधर गोपाल – शाबाब

मनशांती, वात संतुलन

भैरव और यमन
मोहे भूल गये सावरीया
सुनरी पवन पवन पुरवय्या
जागो मोहन प्यारे
दो नैना मतवाले तिहारे
आंसु भरी है ये जीवन की राहें
भुली हुई यादे
मोसम है आशियाना
इन्ही लोगो ने
जब दीप जले आना
वो शाम कुछ अजीब थी
चन्दन स बदन
रे मन सुर मे गा
रंजीशी – गझल - मेहंदी हसन
दिल जो न कह सका
सिनेमे सुलगते है आरमा

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